स्थान: बिहपुर, भागलपुर (बिहार)
आज सुबह से ही सोशल मीडिया पर बिहपुर की कुछ तस्वीरें तैर रही हैं। यकीन मानिए, ये महज़ तस्वीरें नहीं हैं, ये जीवंत दस्तावेज हैं। ये सबूत हैं इस बात का कि क्यों भारत को दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे मज़बूत लोकतंत्र कहा जाता है। ये तस्वीरें उन लोगों के लिए करारा जवाब हैं जो कहते हैं कि ‘एक वोट से क्या होता है?
इन तस्वीरों को देखते हुए, आज मैं सिर्फ एक पत्रकार या लेखक की हैसियत से नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की हैसियत से लिख रहा हूँ, जिसका दिल इन दृश्यों ने छू लिया है। आज का यह लेख ‘अधिकार’, ‘जागरूकता’ और ‘प्रेरणा’ के उन गुमनाम नायकों के नाम है।
पहली तस्वीर: अधिकार के लिए धैर्य की कतार
पहली तस्वीर है एक लंबी कतार की। इसमें महिलाएं हैं, पुरुष हैं, नौजवान हैं, और बुजुर्ग भी। सुबह का ही वक्त है, शायद सूरज अभी ठीक से चढ़ा भी नहीं होगा, लेकिन ये लोग अपना सब काम-धाम छोड़कर, अपने घर की चौखट लांघकर, मतदान केंद्र के बाहर खड़े हैं।
सोचिए, इन कतारों में खड़ी महिलाओं ने सुबह घर का कितना काम निपटाया होगा। किसी को बच्चों को स्कूल भेजना होगा, किसी को खेत में जाना होगा, किसी को चूल्हा-चौका संभालना होगा। लेकिन आज, इन सब ज़िम्मेदारियों से बड़ी एक और ज़िम्मेदारी थी – अपने ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ का इस्तेमाल करने की ज़िम्मेदारी।
यह कतार सिर्फ लोगों की भीड़ नहीं है। यह ‘जागरूकता’ की एक सजीव धारा है। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहपुर का आम नागरिक समझता है कि अगले पाँच सालों तक सवाल पूछने का हक़ उसी को है, जो आज इस कतार में खड़े होकर पसीना बहा रहा है। यह उस उदासीनता को चुनौती है, जो शहरों के एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर ‘सिस्टम’ को कोसती है, लेकिन वोट डालने के दिन को ‘छुट्टी’ समझकर सोती रहती है। इस कतार में खड़ा हर व्यक्ति सिर्फ एक वोटर नहीं, बल्कि एक ‘जागरूक’ पहरेदार है।
दूसरी तस्वीर: जब हिम्मत ने लाचारगी को हराया
अब आते हैं उस तस्वीर पर, जिसने सच में मुझे अंदर तक झकझोर दिया। एक बुज़ुर्ग माँ, शायद चलने-फिरने में भी लाचार, एक व्हीलचेयर पर बैठी हैं। उनके हाथ में शायद उनका वोटर कार्ड या कोई पर्ची है। उनकी झुर्रीदार आँखों में एक ज़िद है, एक संकल्प है। उन्हें कोई और व्हीलचेयर पर धकेल कर ला रहा है।
एक पल को रुकिए और सोचिए। इन माँ जी के लिए घर से निकलकर, गाँव की ऊबड़-खाबड़ सड़कों से गुज़रकर, इस मतदान केंद्र तक पहुँचना कितना मुश्किल रहा होगा। उन्हें दर्द होगा, तकलीफ होगी। वह आराम से घर पर रह सकती थीं। लेकिन नहीं, उन्होंने यह मुश्किल रास्ता चुना। क्यों?
क्योंकि उन्हें अपने ‘अधिकार’ की कीमत पता है। उन्होंने हमसे ज़्यादा दुनिया देखी है। उन्होंने शायद आज़ादी के बाद के बदलते भारत को देखा है। वह जानती हैं कि यह ‘वोट का अधिकार’ उन्हें किसी ने तोहफे में नहीं दिया है, इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई है। उनका व्हीलचेयर पर बैठकर आना, उन तमाम स्वस्थ और सक्षम लोगों के मुँह पर एक तमाचा है, जो ‘गर्मी है’ या ‘भीड़ बहुत है’ का बहाना बनाकर घर बैठे रहते हैं।
ऐसी ही एक और तस्वीर है, जिसमें एक और बुज़ुर्ग बाबा अपनी हाथ से चलाने वाली ट्राइसाइकिल पर बैठकर आए हैं। उनके साथ कुछ लोग खड़े हैं, शायद उनके इस जज़्बे को सहारा देने।
ये बुज़ुर्ग हमारी ‘प्रेरणा’ के सबसे बड़े स्रोत हैं। ये हमें सिखा रहे हैं कि नागरिक होने का मतलब सिर्फ सुविधाएँ भोगना नहीं, बल्कि कर्तव्यों को निभाना भी है। ये हमें याद दिला रहे हैं कि लोकतंत्र सिर्फ एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ‘आस्था’ है। और अपनी आस्था के लिए, हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है। इन दोनों बुज़ुर्गों को मेरा दिल से सलाम!
तीसरी तस्वीर: भविष्य की स्याही
और अंत में, यह तस्वीर। कुछ नौजवान दोस्तों का समूह। सबके चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान है और सबकी तर्जनी उंगली (Index Finger) पर लगी है लोकतंत्र की ‘शाही स्याही’।
यह तस्वीर आज के दौर की सबसे अहम तस्वीर है। यह वह पीढ़ी है जो मोबाइल और इंटरनेट के बीच पली-बढ़ी है। अक्सर इस पीढ़ी पर आरोप लगता है कि वह अपनी दुनिया में मगन है, उसे ज़मीनी हकीकत से कोई मतलब नहीं। लेकिन बिहपुर के ये नौजवान इस सोच को गलत साबित कर रहे हैं।
उनका अपनी उंगली दिखाना महज़ एक ‘सेल्फी’ या ‘पोज़’ नहीं है। यह एक ऐलान है। यह इस बात का ऐलान है कि ‘हम आ गए हैं, हमने अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी है।’ यह ‘जागरूकता’ का वह स्तर है, जहाँ युवा यह समझ रहा है कि उसके गाँव की सड़क, उसके स्कूल की पढ़ाई, और उसके लिए रोज़गार का अवसर, इन सबका फैसला उसी की उंगली पर लगी स्याही से होना है।
यह तस्वीर उम्मीद है। यह भरोसा है कि भारत का भविष्य मज़बूत हाथों में है। यह युवा शक्ति जब अपने ‘अधिकार’ के लिए इतनी सजग है, तो देश का कल निश्चय ही उज्ज्वल होगा।
सिर्फ एक लेख नहीं, एक सलाम हैं
बिहपुर की ये तस्वीरें सिर्फ भागलपुर या बिहार तक सीमित नहीं हैं। ये पूरे भारत की कहानी हैं। ये कहानी हैं उस आम आदमी की, जिसे शायद बड़े-बड़े मंचों पर बोलने का मौका न मिले, लेकिन जब उसे ‘मौका’ मिलता है, तो वह EVM का बटन दबाकर सबसे ज़ोरदार आवाज़ में बोलता है।
आज इन सभी मतदाताओं ने – उस कतार में खड़े हर व्यक्ति ने, उन व्हीलचेयर पर आईं माँ जी ने, उस ट्राइसाइकिल वाले बाबा ने, और उन गर्वित नौजवानों ने – यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र सिर्फ संविधान की किताब में लिखा एक शब्द नहीं है, बल्कि यह हम सबके दिलों में धड़कता एक ‘जज़्बा’ है।










