बिहार की राजनीति इन दिनों जिस प्रकार उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, शायद ही किसी ने सोचा होगा कि विधानसभा चुनाव के खराब नतीजों के बाद लालू प्रसाद यादव के घर के भीतर से ही इतनी तेज़ हलचल उठेगी। चुनाव में राजद को मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर खामोश असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। इसी माहौल में लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने अपने ही परिवार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए घर छोड़ दिया और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ दीं, जिससे पूरा मामला अचानक सुर्खियों में आ गया। अब इस पूरे विवाद पर लालू प्रसाद यादव की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं से विवाद की जगह एकता और पार्टी के प्रदर्शन पर ध्यान देने की अपील की है।
सोमवार को पटना में राजद विधायकों की बैठक के दौरान लालू प्रसाद ने कहा कि यह पूरा मामला पारिवारिक है और इसे परिवार के अंदर ही सुलझा लिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे खुद इस स्थिति को संभालने के लिए मौजूद हैं और पार्टी को इस समय आंतरिक कलह नहीं, बल्कि मजबूती और संगठनात्मक सुधार की जरूरत है। बैठक में तेजस्वी यादव को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया, जो इस बात का संकेत है कि परिवार के भीतर चल रहे तनाव के बावजूद राजनीतिक फैसले अपनी जगह जारी रहेंगे।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक पोस्ट करते हुए ऐलान कर दिया कि वे राजनीति छोड़ रही हैं और परिवार से दूरी बना रही हैं। उन्होंने अपने फैसले के पीछे तेजस्वी यादव के सलाहकार संजय यादव और तेजस्वी के करीबी रमीज को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप था कि पार्टी की करारी हार की जिम्मेदारी इन लोगों की रणनीति और हस्तक्षेप पर है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में राजद सिर्फ 25 सीटें ही जीत पाई — जो पिछले दस सालों में पार्टी का सबसे बुरा प्रदर्शन माना जा रहा है।
बैठक के बाद पाटलिपुत्र से सांसद मीसा भारती ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि परिवार के अंदर इस तरह की बातें होना कोई अनोखी बात नहीं है और ज्यादातर मसले बातचीत से सुलझा लिए जाते हैं। उन्होंने रोहिणी द्वारा लगाए गए आरोपों को हल्के में लेते हुए कहा कि पार्टी को अभी एनडीए द्वारा किए गए चुनावी वादों पर नज़र रखनी चाहिए — जैसे रोजगार के अवसर, जीविका दीदियों को आर्थिक सहायता और बिहार में उद्योगों के विकास के मुद्दे। मीसा ने यह भी साफ किया कि परिवार की संपत्ति को लेकर जो बातें फैलाई जा रही हैं, उनका कोई आधार नहीं है, क्योंकि ईडी और सीबीआई की जांचों के कारण खुद लालू परिवार की संपत्तियां कई तरह की कानूनी निगरानी में हैं।
यह पूरा विवाद इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि लालू प्रसाद यादव स्वास्थ्य समस्याओं के कारण राजनीति में सक्रिय भूमिका कम निभा पा रहे हैं। ऐसे में पारिवारिक मतभेद का असर सीधे-सीधे पार्टी की छवि और उसके समाजिक समीकरण पर पड़ रहा है। राजद का पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक पहले से ही दबाव में है और इस विवाद के बाद राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि पार्टी के लिए एकता बनाए रखना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। भाजपा के कई नेताओं, विशेषकर दिलीप जायसवाल ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे लालू की “पितृसत्तात्मक सोच” का नतीजा बताया और कहा कि लालू परिवार की अंदरूनी लड़ाई अब पार्टी के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन गई है।

इस बीच रोहिणी आचार्य को लेकर एक और पहलू चर्चा में है। कुछ साल पहले उन्होंने अपने पिता लालू प्रसाद को किडनी दान करके देशभर में सराहना पाई थी। अब वही रोहिणी जब परिवार से नाराज़ होकर बाहर चली गईं, तो लोगों की भावनाएँ भी इस मामले में गहराई से जुड़ गई हैं। राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि रोहिणी की नाराज़गी सिर्फ हालिया हार की वजह से नहीं है बल्कि लंबे समय से परिवार और पार्टी के निर्णयों में उपेक्षित महसूस करने की वजह से है, हालांकि इस पर परिवार की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
बिहार की राजनीति में लालू परिवार का इतिहास काफी लंबा रहा है। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद या राबड़ी देवी सत्ता के केंद्र में रहे। 2015 में नीतीश कुमार के साथ महागठबंधन में और फिर 2022 से 2024 तक साझा सरकार में राजद राज्य की सत्ता में मौजूद रहा। ऐसे परिवार में सार्वजनिक विवादों का उभरना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। फिलहाल स्थिति यह है कि परिवार अपनी अंदरूनी लड़ाई को थामने की कोशिश कर रहा है, जबकि विपक्ष इस विवाद को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
अंततः यह मामला सिर्फ एक पारिवारिक झगड़ा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या लालू प्रसाद यादव इस विवाद को शांत कर पाते हैं या यह मसला राजद के सामने एक और चुनौती बनकर उठ खड़ा होता है।










